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Showing posts from September, 2016

अच्छा होता

क्वार कार्तिक की
धुप में तपने से
अच्छा होता
जेठ की दुपहरी
सह लेते
वकावाली खाने
से अच्छा
नीम कसली
खा लेते
मृत्यु की ठंडक
सहने से
बेहतर
जीवन की
गर्मी सह
लेते

सघन वृक्ष
की छांव में
गुम हो रहने
से
धुप- छांव
सह लेते

आराधना राय

घर

मेरे घर के आँगन में वो
अपना घर बसती है
कभी दाना , कभी कतरन
वो खूब चुराती है
चार दानो से खुश
हो जाती है
धड़कने दिल की
वो बढाती है
एक गिलहरी
का घर है
पेड़ के कोटर में
अपने बच्चो को
बड़ा कर फिर
छोड़ देगी वो

कल जो उसका था
आज भी उसका
कोटर होगा वो

मुझे देख ना जाने
क्या कह जाती है वो

उसकी बाते में समझ
नहीं पाती हूँ

आराधना राय

दुनियाँ कविता अतुकांत

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साभार गुगल


छांव - धुप सी है ये दुनियाँ क्या प्रेम प्रीत सी बंधी दुनियाँ चाहे स्वीकार करो ना करो
अपने - अपने ध्रुवों पे अडिग गोल - गोल धूमती है दुनियाँ बोलो दो चाहे चुप तूम रहो 
अपनी - नियति से  बंधे  सच - झूठ के बोल बोलते खानों और अलग खांचो में समय के बोल बोलती है दुनियाँ

ज़िन्दगी

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साभार गुगल
टुकडो - टुकडों में  बंटी
यह ज़िन्दगी  मिली है
गुलाबी सर्द राते जैसे
चादर में लिपटी हुई है
मद्धम - मद्धम बदली है
सर्दी तो  कभी गर्मी है
नर्म तानो बानो से बुनी
सात रंगों के रंग में रंगी
काली, नीली कभी पीली
ज़िन्दगी के ताने - बाने  है
सुलझते- उलझते मन के
तार कभी टूट कर जुड़ते है
आशा , निराशा में बंध के
चाँद सितारे आसमां रोते है
दिन के चटकीले  रंगों में
आंसू भी छिप से जाते है
रात को शबनम बन कर
मेरे मन पे तन पे गिरते है
आराधना राय अरु


तूम पूछो मैं बतलाऊँ

तूम पूछो  मैं  बतलाऊँ
मैं कहूँ तूम सुनते जाओ जीवन की रीत अनोखी सी जिसमें  यूँ ही बहती जाऊँ तूम पूछो  मैं  बतलाऊँ चाँद अकेला ही रहता है या ताका करता है धरती को चन्द्र- चकोर की बातों की प्रीत क्या तूम को सिखलाऊँ
तूम पूछो  मैं  बतलाऊँ नहीं नाचता मयूर सा मनवा थाप नहीं जब धड़कन की तूम पूछो  मैं  बतलाऊँ बदल - बिजुरी का क्या नाता क्या दिल की बात समझाऊँ बदरा बोले बिजली चमके  तब मन मयूर सा झनके  बोलो प्रीत की रीत समझाऊँ तूम पूछो  मैं  बतलाऊँ
आराधना राय

अतुकांत

पेड़ की सूखी डाली पे एक हरी पत्ती को देखा है तुमने उम्मीद है किसी के जीवन जीने की उसी पेड़ पर बसेरा चिडियों का देखा है तोड़ कर सीमायें अनंत को पा जाती है अपना बसेरा वो तो खुद ही बनाती है पेड़ की सूखी डाली खुश है पेड़ भी खुश था उडान के बीच पर झंझावातो पर नजर किस की थी सुना है वही पेड़ कल रात तूफान में मुस्तेदी से लड़ा था अडिग अकेला ना जाने कितनी बार हर वार से बचा था पेड़ सुबह मुस्कुरा रहा था डाली अब सूखी नहीं थी  जीवन और संधर्ष के बीच मुस्कुरा रही थी

अतुकांत

ज़ज्बात बोलते हैआँखों के तले
मन में ज़ज्बातो के तूफान पले
खामोश हो घंटो तुम्हे सुनती हूँ
तेरा अहसास होने का नहीं क्या
वजूद को अपने साथ बुन लेती हूँ
तूम बोलते हो में सुन तुम्हे लेती हूँ


  आराधना राय अरु

किसे बतलाऊँ

तूम से ना करते तो किस से शिकायत करते
उम्मीद तुम्ही से थी तो किस से तकाज़ा करते

माना के सितम कम ना हुए तुम्हारे इन वादों से
तूम से बांधी डोर आस की जीने- मरने के बाद की


दिल की बाते  क्या इकरार की इनकार तुमसे की
बंधन तूम से हर बंधा था अरमान का या प्यार का


 तुम्ही को जाना था धरती औरआसमान का रिश्ता
अब साथ नहीं है यदपि तुम्हारा बोलो किसे बतलाऊँ

आराधना रायअरु

ना आ सकूँगी

मेरी  सोच के परदे पे तूम रोज़ आ जाते हो मुझे अपनी बेबसी का कारण रोज़ बनाते हो
 तेल से हाथ जल गया कल करछुल छुट गई यही रामायण- महाभारत धर की बताते  हो 
कह चुकी हूँ प्रिय ना लौट कर तुम्हारे लिए भगवान से झगड़ा कर के भी ना आ सकूँगी
तुम्हारी महक अब भी सांसो में बसी है मेरे प्राण छुट कर नहीं छुटते  मेरे तुम्हारे बिन 
यही बातें है जो अब नहीं कह- सुन पाऊँगी तुम्हारे मन के तारों से नाता नहीं टुटा मेरा
जहाँ सदा के लिए सब छोड़ मायके आई हूँ तुम्हारी बन कर नहीं रह पाऊँगी  ना आऊँगी
जा कर कब कौन आ पाता यहाँ पर सदा से  लौट कर पीछे मुड कर बस तुम्हे देखती हूँ
अनजाना सपना है, सच तुम मेरी सोच हो या तुम्हारी सोच मैं अब भी हूँ कही पर तो
आराधना राय

आज फिर कोई

दिल को आज फिर कोई
और शेर याद आया है

तेरे रुखसार से लिपटा
हुआ  फूल याद आया है

तेरे जाने की ज़िद ने ना
पूछ कौन से ज़ख्म पाए है

रोशनी ने जलाने की ठानी
चाँदनी का मरहम लगाया है

जीने वालो ने मरने के लिए
देख क्या ख्वाब सजाया है

आराधना राय अरु

जान लेने के बाद

क्या जीवन में शेष रहा है
तुझे जान लेने के बाद

प्राचीर नव श्रंखलाओं की
 शिखर देख लेने के बाद

उतुंग , उन्मत ललाट
पाया जग ने नव विधान

क्या जान पाई शुधित तृषित
 चातक कि अनभिज्ञ पुकार

मान कर माना ना जिसे
क्या होगा उस पल का उपहास

शकुन्तला का दुष्यंत पर
भरत ने माना था उपकार

सुन ह्दय तू भी मेरे साथ
आए थे उस दिन सूर्य चन्द साथ

आराधना राय अरु

अलबेली

नयनो के कोर से काज़ल चुराया है
आसमान से शायद बिदियाँ लगी है
लोगों ने समझा होगा कोई धब्बा है
माँ के लिए नज़र बट्टू का ठिगोना है
पूछती फिर भी संध्या की सहेली है
रात तारों वाली कितनी अलबेली है


दिन सावन था हरा -हरा सब जब था
द्वार तक आती थी नदियाँ सहेली सी
बारिश के मौसम में रंग अलबेला  सा
माँ के हाथ की होती भजिया पकोड़ी थी

एक सपना मैन देखा है माँ तुझे देखा है
धुप , बारिश में ठड के महीने में देखा है
चारोंपहर बस तुझे काम करते देखा है
भगवान अनोखा इस दुनियाँ में देखा है

आराधना राय  अरु